Ek dil ki shayeri - Best Poetry

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एक दिल की शायरी
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मां  क्या  गई  कि साथ में बरकत चली गई  दिल  का  सुकून  रूह  की  राहत चली गई
मैं रहूंगा न मेरा अक्स ही कहीं होगा यूं तेरे सामने होने को ज़माना होगा।
नमाज़ें कर रहे हैं हम क़ज़ा ऐसे नहीं होता  भुला बैठे हैं हम अपना ख़ुदा ऐसे नहीं होता
मैं फ़र्द हूँ एक आम सा एक क़िस्सा-ए-ना तमाम सा,
दिन भर की गर्दिश से थक कर लौट गया। शाम  हुई   तो  सूरज  भी  घर  लौट गया।
मुश्किलों का सामना गर करेगा ही नहीं तू जीतेगा कैसे जब लड़ेगा ही नहीं
इस कोरोनावायरस की महामारी पर एक बेहतरीन ग़ज़ल।।
चर्चा  हमारा  इन दिनों  है  आम  दुनिया  में।  हम भी नहीं कम  आपसे  बदनाम दुनिया में।
जाते हो तो जाओ अब लौट कर मत आना।  लौट कर जब आओ तो मेरे घर मत आना।
हम मुसाफिरों का कहाँ पुख़्ता ठिकाना होता है  शाम  जहाँ  ढल  जाये  वहीं अशियाना होता है
रात -सा चुपचाप खोया खोया सा भी है   रंज ओ ग़म में ख़ूब मुब्तला है आदमी
आयशा के दिल का दर्द:-
माना, के वो भी आजतक, माना तो है नहीं  हमने भी उसके  शहर  से,  जाना तो है नहीं
नज़दीक दिल के आज भी इक दिलरुबा लगे, यह दिल उसी  के  प्यार  में  अब  बाबरा  लगे।
किसी की बातों में आने से फायदा क्या है तुम्हारे सामने दुनिया का मरतबा क्या है
रोज ही टकटकी लगा, दुनिया को यूँ देखता हूँ,  क्या चल रहा होगा मन में इनके, यूँ सोचता हूँ!
टोकना मत अमीर बच्चों को ये हिदायत न झेल पाएँगे
अब तक यही सुना था के बाजार बिक गए  उस की गली गए तो खरीददार बिक गए
सुकूत ए मर्ग से डर कर शहर हमने बदल डाला। परिन्दें जब लगे मरने शजर हमने  बदल  डाला॥
शज़र चुपचाप से, मायूस से, तन्हा नज़र आये।  परिंदे घोसलों से उड़  गये जब  उनके पर आये।।