आयशा के दिल का दर्द:-
कितना रोती थी रात भर पापा।
अपनी ग़ुर्बत को कोस कर पापा।
ज़िन्दगी नर्क बन गई थी मेरी।
छोड़ आई पिया का घर पापा।
कितना दागा है जिस्म को मेरे।
उफ़ नहीं की कभी मगर पापा।
जिस्म नीला है मार से मेरा।
देख लो ज़ुल्म का असर पापा।
क़र्ज़ लेकर ही कुछ उन्हें देते।
ऐसा कहता है पूरा घर पापा।
इस ग़रीबी में ब्याहने की जगह।
मुझको दे देते तुम ज़हर पापा।


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