माना, के वो भी आजतक, माना तो है नहीं हमने भी उसके शहर से, जाना तो है नहीं

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एक दिल की शायरी

माना, के वो भी आजतक, माना तो है नहीं हमने भी उसके शहर से, जाना तो है नहीं

 माना, के वो भी आजतक, माना तो है नहीं

हमने भी उसके  शहर  से,  जाना तो है नहीं


रक्खी है कू-ए-यार की, मिट्टी  संभाल के

इससे बड़ा ज़मीन पे, खज़ाना तो है नहीं


कुछ लोग तेरे  शहर के,  ख़ंजर-ब-दस्त हैं

कुछ हमने बाज इश्क़ से, आना तो है नहीं


कहते हैं लोग उनसे कहो, जा के हाल-ए-दिल

अब हमने अपनी  जान से,  जाना  तो है  नहीं


ख़ाना-बदोश लोग हम, दुनिया का क्या करें

दुनिया से ले के साथ कुछ, जाना तो है नहीं


मिलते हैं जिस ख़ुलूस से, हर किसी के साथ

वैसे ये  इस  तरह  का,  ज़माना  तो  है  नहीं


कुछ इसलिए भी आजतक, रूठे नहीं हैं हम

आ के  किसी  ने  हमको,  मनाना तो है नहीं



Hindi-shayari
एक दिल की शायरी



मुबारक सिद्दीक़ी


कू-ए-यार=महबूब की गली

ख़ंजर-ब-दस्त=हाथ में ख़ंजर  लिए हुए

ख़ुलूस से=प्रेम से, मुहब्बत से

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