हम मुसाफिरों का कहाँ पुख़्ता ठिकाना होता है
शाम जहाँ ढल जाये वहीं अशियाना होता है
कैसा अजीब मर्ज है यह दर्द ए मुहब्बत भी
मीठा लगने लगता है ज्यूँ ज्यूँ पुराना होता है
वक़्त कहाँ रुकता है ये तो चलता ही रहता है
जीने के लिये लम्हों को इससे चुराना होता है
जहाँ तक पहुँच पाये वही मंज़िल लगेगी
बस ज़रा सा अपने दिल को समझाना होता है
अपनी हस्ती मिटा लेतें हैं लोग, अना* के वास्ते
यूँ कहने को तो ज़रा सा सर झुकाना होता है
उन्हें भी गुमनामी की मौत मरते देखा है
खुशहाली में जिनके साथ ज़माना होता है
फरेब खाकर भी जो इंसानियत की राह न छोड़े
ऐसा तो 'राज' तुझसा कोई दीवाना होता है


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