शम्मा ख़ामोश है गुल भी नहीं गुलदानों में, फिर भी हलचल सी मची रहती है परवानों में।

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एक दिल की शायरी

शम्मा ख़ामोश है गुल भी नहीं गुलदानों में, फिर भी हलचल सी मची रहती है परवानों में।

 ग़ज़ल ----

बेहतरीन-ग़ज़ल


शम्मा  ख़ामोश  है  गुल  भी  नहीं गुलदानों में,

फिर भी हलचल सी मची रहती है परवानों में।


राहे  उलफ़त  में  सिला ऐसा रक़ीबों से मिला,

दर्ज  हर  एक  हक़ीक़त   हुई   अफ़सानों  में।


जुस्तजू  मन्ज़िले  मक़सूद  में कुछ  यूं उलझा,

गिनती  मेरी  भी  हुई   वक़्त  के   दीवानों  में।


में हरम और सनम ख़ानों में   गिरजा  में  रहा,

क्यों  मुझे  ढूंढा  गया  शह्र  के   मयख़ानों  में।


किस को महफ़ूज़ कहूँ किस को कहूँ ख़तरे में,

क़त्ल  हो  जाते  हैं जब ख़ुद के शाबिस्तानों में।


हर मोहल्ले में कुछ अच्छे हैं बुरे  लोग हैं  कुछ,

ख़ार  और  फूल  कली  सब  हैं  गुलिस्तानों में।


यह  मोहब्बत  है  इसे  दिल से  कमाना हो गा, 

यह  ने  बाज़ार  में  मिलती  है  न   दूकानों  में।


रोटी  खाई  कि  नहीं  जिस्म  ढका है कि नहीं,

न  क़लन्दर  में  है  यह  फ़िक्र  न  मस्तानों  में।


' मेहदी ' है  सामने  तो  कैसे  भुलाए  गा कोई,

न   तो   वीरानों   में   रहता  है  न  बेगानों  में।


मेहदी अब्बास रिज़वी

   " मेहदी हल्लौरी "

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